भारतीय संस्कृति की पौराणिक कथाएँ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन के गूढ़ सत्य, नैतिकता, भक्ति और आत्मबोध का स्रोत हैं। ध्रुव की कथा ऐसी ही एक अमर गाथा है, जिसमें एक बालक की अदम्य आस्था, माता की ममता, सौतन की ईर्ष्या और परमात्मा की कृपा का अद्भुत संगम है। यह कथा न केवल बच्चों के लिए, बल्कि हर उम्र के साधकों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
ध्रुव की कथा में जीवन के अनेक महत्वपूर्ण पहलुओं का दर्शन होता है कठिनाइयों में धैर्य, गुरु की महत्ता, तपस्या की शक्ति, और सबसे बढ़कर सच्ची भक्ति की अपार शक्ति। यह कथा सिखाती है कि यदि मनुष्य में दृढ़ निश्चय और ईश्वर में अटूट विश्वास हो, तो कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती।

राजा उत्तानपाद और रानी सुनीति का परिचय
राजा उत्तानपाद प्रतापी, न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ शासक थे। उनके राज्य में समृद्धि, शांति और न्याय का बोलबाला था। वे प्रजा के प्रति दयालु, सजग और सदैव धर्म के मार्ग पर चलने वाले थे। उनके शासनकाल में कला, संस्कृति और धर्म का विकास हुआ। राजा का जीवन सरल था, वे भव्य महलों से अधिक प्रजा की भलाई में विश्वास रखते थे।
रानी सुनीति अत्यंत सदाचारी, धर्मपरायण और विनम्र थीं। वे नियमित रूप से मंदिरों में पूजा करतीं, दान-पुण्य करतीं और संतान प्राप्ति के लिए व्रत-उपवास रखतीं। संतानहीनता की पीड़ा उनके मन में गहराई तक थी। वे भगवान से प्रार्थना करतीं कि उन्हें संतान की प्राप्ति हो, जिससे वे परिवार और राज्य की परंपरा को आगे बढ़ा सकें।
एक दिन राजा-रानी उद्यान में चिंतित बैठे थे, तभी नारद मुनि प्रकट हुए। उन्होंने रानी सुनीति से कहा:
“हे रानी! शीघ्र ही तुम्हारे जीवन में परिवर्तन आएगा। राजा का दूसरा विवाह होगा, तभी तुम्हें भी संतान प्राप्त होगी।”
रानी ने आश्चर्य और दुःख के मिश्रित भाव से पूछा:
“मुनिवर! क्या मुझे अपने पति को बाँटना पड़ेगा?”
नारद जी ने मुस्कराकर कहा:
“यह सब ईश्वर की लीला है। धैर्य रखो, सब मंगल होगा।”
यह सुनकर रानी के मन में आशा की किरण जगी, पर साथ ही एक अनजाना दुःख भी था।
दूसरा विवाह और सुरुचि का प्रवेश
समय बीतने पर राजा उत्तानपाद ने सुनीति की छोटी बहन सुरुचि से दूसरा विवाह किया। सुरुचि ने विवाह से पूर्व नगर की सीमा पर राजा से कठोर शर्तें रखीं:
- बड़ी रानी को महल से निकालकर दूसरे मकान में रखा जाएगा।
- सुनीति को प्रतिदिन केवल सवा सेर अन्न मिलेगा।
- सुरुचि के पुत्र को ही राज्य का उत्तराधिकारी बनाया जाएगा।
राजा विवश थे। उन्होंने शर्तें मान लीं। सुनीति, जिसने अपनी बहन का विवाह स्वयं कराया था, अब उसी के कारण अपमान और तिरस्कार का जीवन जीने लगी। सुरुचि के मन में भी यह पीड़ा थी कि उसे वृद्ध राजा से विवाह करना पड़ा, लेकिन वह अपनी बहन से ईर्ष्या भी करती थी।
सुनीति को महल से निकालकर नगर के बाहर एक छोटे बाग में रखा गया। वहाँ न कोई सुख-सुविधा थी, न सम्मान। सुनीति ने अपने दुःख को भगवान की भक्ति में बदल दिया। वे हर दिन पुत्र की कामना से प्रार्थना करतीं, अपनी पीड़ा को छुपाकर धैर्य और त्याग का जीवन जीती रहीं।
ध्रुव और उत्तम का जन्म
कुछ समय बाद रानी सुनीति ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम ध्रुव रखा गया। ध्रुव बाल्यकाल से ही बुद्धिमान, साहसी और भक्ति में लीन था। उसकी आँखों में तेज और मुख पर शांति का भाव था। माँ ने उसे धर्म, त्याग और सहनशीलता की शिक्षा दी।
इसके कुछ समय बाद सुरुचि के गर्भ से भी पुत्र हुआ, जिसका नाम उत्तम रखा गया। उत्तम महल की विलासिता और माँ के दुलार में पला-बढ़ा। उसके लिए हर सुख-सुविधा उपलब्ध थी। दोनों भाइयों के जीवन में गहरा अंतर था एक अभाव और संघर्ष में, दूसरा ऐश्वर्य और दुलार में।
ध्रुव का जीवन तिरस्कार और उपेक्षा से भरा था, जबकि उत्तम को हर जगह सम्मान और प्रेम मिलता था। यह भेदभाव आगे चलकर कथा की दिशा तय करता है।
ध्रुव का अपमान और संकल्प
जब ध्रुव पाँच वर्ष का और उत्तम चार वर्ष का हुआ, तो नगर में उत्तम का जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया। महल सजा, बाजे बजे, नगरवासी आमंत्रित हुए। ध्रुव का जन्मदिन नहीं मनाया गया, जो सुरुचि की ईर्ष्या का परिणाम था।
ध्रुव ने माँ से जिद की कि वह महल जाकर जन्मदिन देखना चाहता है। माँ ने समझाया कि वहाँ उसका कोई स्थान नहीं है, परंतु ध्रुव जिद पर अड़ा रहा। वह अकेला महल पहुँचा। राजा सिंहासन पर बैठे थे, सुरुचि बगल में, उत्तम उनकी गोद में। ध्रुव दौड़कर पिता की गोद में बैठ गया। सुरुचि ने क्रोध में आकर ध्रुव को सिंहासन से नीचे गिरा दिया, लात मारी और बोली:
“यह स्थान सौतन के पुत्र के लिए नहीं है! यह मेरे पुत्र उत्तम के लिए है!”
ध्रुव रोता हुआ पिता की ओर देखता रहा, पर राजा मौन रहे। कोई मंत्री, दरबारी, नर्तकी किसी ने भी ध्रुव को सहारा नहीं दिया। ध्रुव रोता हुआ अपनी माँ के पास लौटा।
रानी सुनीति ने ध्रुव को गले लगाया। ध्रुव ने आँसू भरी आँखों से पूछा:
“माँ, राजा कौन बनता है?”
सुनीति ने उत्तर दिया:
“बेटा, राजा भगवान बनाता है।”
ध्रुव ने फिर पूछा:
“भगवान कहाँ मिलते हैं?”
माँ ने सहज भाव से कहा:
“वन में तपस्या करने से भगवान मिलते हैं।”
ध्रुव ने दृढ़ संकल्प लिया:
“मैं वन जाऊँगा, तपस्या करूँगा और भगवान से राज्य माँगूँगा!”
वन गमन और नारद मुनि की दीक्षा
ध्रुव माँ की अनुमति लेकर घर से निकल पड़ा। रानी सुरुचि ने नौकर के माध्यम से राजा को सूचना दी। राजा दौड़े आए और बोले:
“बेटा! ऐसा मत कर, मैं तुझे आधा राज्य दे दूँगा।”
ध्रुव ने दृढ़ता से उत्तर दिया:
“पिता! आप तो छोटी माता से डरते हैं, राज्य नहीं दे पाएँगे। मैं भगवान से राज्य प्राप्त करूँगा।”
राजा स्तब्ध रह गए। ध्रुव अकेला, आँसू भरी आँखों से, घने जंगल की ओर बढ़ गया।
नारद मुनि से भेंट और दीक्षा
रास्ते में नारद मुनि मिले। उन्होंने स्नेह से पूछा:
“बेटा, कहाँ जा रहे हो?”
ध्रुव ने सारी व्यथा कह सुनाई। नारद जी ने कहा:
“बिना गुरु के साधना निष्फल है।”
ध्रुव ने विनती की:
“मुनिवर! आप ही मेरे गुरु बन जाइए।”
नारद जी ने दीक्षा दी, मंत्र सिखाया और तपस्या का मार्ग बताया:
“बेटा, एक पैर पर खड़े होकर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करो।”
ध्रुव की घोर तपस्या
ध्रुव ने घने वन में जाकर एक पैर पर खड़े होकर तपस्या आरंभ की।
- पहले महीने केवल फल खाए।
- दूसरे महीने केवल जल पिया।
- तीसरे महीने श्वास पर नियंत्रण किया।
- चौथे महीने केवल वायु पर जीवित रहे।
- पाँचवे महीने भोजन-जल त्याग दिया, केवल मंत्र जाप में लीन हो गए।
शारीरिक और मानसिक कठिनाइयाँ
ध्रुव का शरीर दुर्बल हो गया, परंतु उसकी आत्मा और संकल्प अडिग रहे। उसकी तपस्या से पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल तक कंपन होने लगा। देवता भयभीत हुए, नारद जी ने देवताओं को समझाया कि यह बालक अद्भुत है।
प्रकृति और देवताओं की प्रतिक्रिया
वन के पशु-पक्षी भी उसकी तपस्या से प्रभावित होकर शांत हो गए। वृक्षों ने छाया दी, फूलों ने सुगंध बिखेरी। देवताओं ने उसकी परीक्षा लेने के लिए तरह-तरह के मायाजाल रचे, परंतु ध्रुव की साधना में कोई बाधा नहीं आई।
भगवान विष्णु का प्रकटन और वरदान
छठे महीने, ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए। उन्होंने कहा:
“बेटा! क्या माँगता है?”
ध्रुव ने सिर झुकाकर कहा:
“मुझे अटल राज्य दीजिए, जिससे कोई मुझे सिंहासन से न हटा सके।”
दिव्य वरदान
भगवान ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया:
“तुझे स्वर्ग में ध्रुवमंडल का राज्य मिलेगा, जो अटल रहेगा। जीवन भर भक्ति कर, घर लौट जा।”
भगवान के दर्शन से ध्रुव का हृदय आनंद और संतोष से भर गया। उसकी साधना सफल हो गई थी।
घर वापसी, राज्याभिषेक और जीवन का विस्तार
ध्रुव घर लौटा। उसकी भक्ति और तपस्या से प्रभावित होकर रानी सुरुचि भी नम्र हो गईं। उन्होंने सुनीति को सामान्य जीवन जीने की अनुमति दी। उत्तम का विवाह हुआ, राज्य भी उत्तम को मिला। ध्रुव का भी विवाह हुआ। परिवार में शांति लौट आई।
एक बार गंधर्वों से युद्ध में उत्तम की मृत्यु हो गई। ध्रुव ने गंधर्वों से युद्ध कर विजय प्राप्त की। उत्तम की मृत्यु के बाद पृथ्वी का राज्य भी ध्रुव को मिला। उत्तम की पत्नी भी ध्रुव को दी गई।
ध्रुव ने न केवल पृथ्वी पर, बल्कि स्वर्ग में भी ध्रुवमंडल का राज्य प्राप्त किया। उसकी भक्ति, हठ और आस्था ने उसे अमर बना दिया।
कथा से शिक्षाएँ
- भक्ति की शक्ति: सच्ची भक्ति से असंभव भी संभव हो जाता है।
- मातृ आशीर्वाद: माँ का आशीर्वाद संतान को महान बना देता है।
- गुरु का महत्व: बिना गुरु के साधना अधूरी है।
- अहंकार का पतन: सुरुचि का अहंकार अंततः नष्ट हुआ।
- सहनशीलता और धैर्य: जीवन में कठिनाइयाँ आएँगी, परंतु धैर्य और आस्था से सब पार हो जाता है।
ध्रुव की कथा आज भी हर बालक, युवा और साधक के लिए प्रेरणा का स्रोत है। ध्रुव तारा के रूप में वह आज भी आकाश में चमक रहा है, जो हमें सिखाता है कि सच्ची लगन और भक्ति से कोई भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
ध्रुव की कथा केवल एक बालक की विजय नहीं, बल्कि हर उस आत्मा की विजय है, जो भक्ति, संघर्ष, और सत्य के मार्ग पर चलता है।
आधुनिक संदर्भ और सांस्कृतिक प्रभाव
- ध्रुव तारा: आज भी आकाश में सबसे स्थिर तारा, जो दिशाभ्रमित यात्रियों का मार्गदर्शन करता है।
- सांस्कृतिक उत्सव: भारत के विभिन्न भागों में ध्रुव की कथा का मंचन, भजन-कीर्तन और बच्चों को प्रेरित करने के लिए कहानियों का आयोजन।
- शिक्षा: कई विद्यालयों में ध्रुव की कथा को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है ताकि बच्चों में भक्ति, धैर्य और आत्मविश्वास का विकास हो।
FAQ (सामान्य प्रश्न)
Q1: ध्रुव तारा किसे कहते हैं?
A: ध्रुव तारा आकाश का सबसे स्थिर तारा है, जिसे अंग्रेज़ी में पोल स्टार (Polaris) कहते हैं। यह ध्रुव की भक्ति और वरदान के प्रतीक के रूप में जाना जाता है।
Q2: ध्रुव की कथा से क्या शिक्षा मिलती है?
A: यह कथा सिखाती है कि सच्ची भक्ति, धैर्य, माँ का आशीर्वाद और गुरु का मार्गदर्शन जीवन में असंभव को भी संभव बना सकता है।
Q3: ध्रुव ने कौन सा मंत्र जपा था?
A: ध्रुव ने “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप किया था।
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📢 निष्कर्ष:
ध्रुव की कथा न केवल साहित्यिक और भावनात्मक दृष्टि से, बल्कि सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि से भी अद्वितीय है। यदि जीवन में लक्ष्य, भक्ति और गुरु का मार्गदर्शन हो, तो कोई भी बाधा स्थायी नहीं रहती। ध्रुव का नाम आज भी आकाश में अमर है ध्रुव तारा के रूप में, जो अटल, स्थिर और सबका पथप्रदर्शक है।
“हरि अनंत हरि कथा अनंता”
(नोट: यह कथा विष्णु पुराण और भागवत पुराण पर आधारित है। चित्रों के लिए कॉपीराइट-मुक्त स्रोतों का उपयोग करें।)
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय! 🙏
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